श्री विष्णु विजय स्तोत्रम् | Vishnu Vijay Stotra

विष्णु विजय स्तोत्र भगवान विष्णु के सभी अवतारों की स्तुति है। पद्मपुराण में वर्णित यह स्तोत्र युग-युग में उनके महत्त्वपूर्ण कार्यों और भक्तिप्रधान संदेशों का ज्ञान देता है। इसे सुनें और पढ़ें, और भक्ति भाव में मग्न हों।

श्लोक १

देवा ऊचुः
नताः स्म विष्णुं जगदादिभूतं
सुरासुरेन्द्रं जगतां प्रपालकम् ।
यन्नाभिपद्मात्किल पद्मयोनि-
र्बभूव तं वै शरणं गताः स्मः ॥१॥

अर्थ
हम भगवान विष्णु को प्रणाम करते हैं, जो जगत के आदि हैं, देवताओं और असुरों के अधिपति हैं, जगत के रक्षक हैं। जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न होकर ब्रह्मा प्रकट हुए। हम उन्हीं की शरण में आए हैं।


श्लोक २

नमो नमो मत्स्यवपुर्धराय
नमोऽस्तु ते कच्छपरूपधारिणे ।
नमः प्रकुर्मश्च नृसिंहरूपिणे
तथा पुनर्वामनरूपिणे नमः ॥२॥

अर्थ
हे प्रभु! आपको बार-बार नमस्कार है—आपके मत्स्य अवतार को, कच्छप अवतार को, नृसिंह रूप को और वामन रूप को।


श्लोक ३

नमोऽस्तु ते क्षत्रविनाशनाय
रामाय रामाय दशास्यनाशिने ।
प्रलम्बहन्त्रे शितिवाससे नमो
नमोऽस्तु बुद्धाय च दैत्यमोहिने ॥३॥

अर्थ
हे परशुराम! क्षत्रियों का विनाश करने वाले आपको नमस्कार। हे रामचन्द्र! रावण का संहार करने वाले आपको नमस्कार। प्रलंब दैत्य का वध करने वाले बलराम को प्रणाम। और असुरों को मोहित करने वाले बुद्ध रूप को भी प्रणाम।


श्लोक ४

म्लेच्छान्तकायापि च कल्किनान्ने
नमः पुनः क्रोडवपुर्धराय ।
जगद्धितार्थं च युगे युगे भवान्
विभर्ति रूपं त्वसुराभवाय ॥४॥

अर्थ
कल्कि अवतार लेकर म्लेच्छों का संहार करने वाले प्रभु को नमस्कार। वराह रूप धारण करने वाले को भी प्रणाम। हे प्रभु! आप युग-युग में जगत की रक्षा के लिए और असुरों के नाश के लिए भिन्न-भिन्न रूप धारण करते हैं।


श्लोक ५

निषूदितोऽयं ह्यधुना किल त्वया
दैत्यो हिरण्याक्ष इति प्रगल्भः ।
यश्चेन्द्रमुख्यान् किल लोकपालान्
संहेलया चैव तिरश्चकार ॥५॥

अर्थ
हे प्रभु! आपने अभी-अभी दुष्ट दैत्य हिरण्याक्ष का वध किया, जिसने इन्द्र आदि लोकपाल देवताओं का अपमान किया था और उन्हें संकट में डाल दिया था।


श्लोक ६

स वै त्वया देवहितार्थमेव
निपातितो देवधर प्रसीद ।
त्वमस्य विश्वस्य विसर्गकर्ता
ब्राह्मेण रूपेण च देवदेव ॥६॥

अर्थ
हे देवाधिदेव! देवताओं की भलाई के लिए आपने उसका वध किया। आप ही इस विश्व के सृष्टिकर्ता हैं, जो ब्रह्मा के रूप में सृजन करते हैं। कृपया प्रसन्न हों।


श्लोक ७

पाता त्वमेवास्य युगे युगे च
रूपाणि धत्से सुमनोहराणि ।
त्वमेव कालाग्निहरश्च भूत्वा
विश्वं क्षयं नेष्यसि चान्तकाले ॥७॥

अर्थ
आप ही इस जगत के पालनहार हैं, और युग-युग में मनोहर अवतार धारण करते हैं। अंतकाल में आप ही कालाग्नि बनकर इस सृष्टि का संहार करते हैं।


श्लोक ८

अतो भवानेव च विश्वकारणं
न ते परं जीवमजीवमीश ।
यत्किञ्च भूतं च भविष्यरूपं
प्रवर्तमानं च तथैव रूपम् ॥८॥

अर्थ
हे ईश्वर! आप ही इस सृष्टि के कारण हैं। आपसे बढ़कर कोई अन्य नहीं—जीव भी आप ही हैं, और अजीव भी आप ही हैं। जो भूतकाल है, भविष्य है और वर्तमान है—सब आप ही का रूप है।


श्लोक ९

सर्वं त्वमेवासि चराचराख्यं
न भाति विश्वं त्वदृते च किञ्चित् ।
अस्तीति नास्तीति च भेदनिष्ठं
त्वय्येव भातं सदसत्स्वरूपम् ॥९॥

अर्थ
चर-अचर सब आप ही हैं। आपसे अलग कुछ भी नहीं दिखता। “अस्ति” और “नास्ति” का भेद भी आप ही में विद्यमान है। आप ही सत्य और असत्य के स्वरूप हैं।


श्लोक १०

ततो भवन्तं कतमोऽपि देव
न ज्ञातुमर्हत्यविपक्वबुद्धिः ।
ऋते भवत्पादपरायणं जनं
तेनागताः स्मः शरणं शरण्यम् ॥१०॥

अर्थ
हे देव! अपरिपक्व बुद्धि वाला कोई भी व्यक्ति आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जान सकता। आपके चरणों का आश्रय लेने वाला ही जान सकता है। इसलिए हम सब आपकी शरण में आए हैं।


श्लोक ११

व्यास उवाच
ततो विष्णुः प्रसन्नात्मा उवाच त्रिदिवौकसः ।
तुष्टोऽस्मि देवा भद्रं वो युष्मत्स्तोत्रेण साम्प्रतम् ॥११॥

अर्थ
व्यास जी कहते हैं—तब प्रसन्नचित्त भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा—“देवगणो! मैं तुम लोगों से प्रसन्न हूँ। तुम्हारे इस स्तोत्र से मैं संतुष्ट हूँ।”


श्लोक १२

य इदं प्रपठेद्भक्त्या विजयस्तोत्रमादरात् ।
न तस्य दुर्लभं देवास्त्रिषु लोकेषु किञ्चन ॥१२॥

अर्थ
जो कोई इस विजयस्तोत्र का भक्तिभाव से पाठ करेगा, उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।


श्लोक १३

गवां शतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् ।
तत्फलं समवाप्नोति कीर्तनाच्छ्रवणान्नरः ॥१३॥

अर्थ
जो फल एक लाख गौदान करने से मिलता है, वही फल इस स्तोत्र का कीर्तन और श्रवण करने से मनुष्य को प्राप्त होता है।


श्लोक १४

सर्वकामप्रदं नित्यं देवदेवस्य कीर्तनम् ।
अतः परं महाज्ञानं न भूतं न भविष्यति ॥१४॥

अर्थ
देवदेव भगवान विष्णु का कीर्तन सभी कामनाओं को पूरा करने वाला है। इससे बड़ा ज्ञान न तो कभी हुआ है, न कभी होगा।


🌸 फलश्रुति

इस प्रकार पद्मपुराण में वर्णित विष्णु विजय स्तोत्र सम्पूर्ण होता है।

 

📖 निष्कर्ष (सार):
👉 यह स्तोत्र भगवान विष्णु के विविध अवतारों की स्तुति करता है और अंत में फलश्रुति में इसे सर्वकामप्रद और परम ज्ञानदायी बताया गया है।

FAQ (Frequently Asked Questions)

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  1. Q: विष्णु विजय स्तोत्र क्या है?
    A: यह स्तोत्र भगवान विष्णु के सभी अवतारों और उनके महत्त्वपूर्ण कार्यों का वर्णन करता है।

  2. Q: इस स्तोत्र को कैसे पढ़ें?
    A: इसे भक्तिभाव से पढ़ें या सुनें। नियमित पाठ से भक्ति और ज्ञान दोनों बढ़ते हैं।

  3. Q: विष्णु विजय स्तोत्र का स्रोत कौन सा है?
    A: यह स्तोत्र पद्मपुराण में वर्णित है।

  4. Q: इस स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ होता है?
    A: भक्तिप्रद पाठ से मनुष्य को आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।