त्रिकाल संध्या स्तोत्र | Trikal Sandhya
त्रिकाल संध्या का महत्व हिंदू धर्म में अत्यंत उच्च है। इस स्तोत्र का पाठ प्रातः, मध्यान्ह और संध्याकाल में करने से मन, वचन और कर्म शुद्ध होते हैं। यहाँ पाएं त्रिकाल संध्या स्तोत्र के श्लोक, हिंदी व अंग्रेज़ी अर्थ और इसके आध्यात्मिक लाभ।
त्रिकाल संध्या – दिन के तीन पवित्र दान
शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य को दिन में तीन महत्वपूर्ण समय—प्रातःकाल, भोजन से पूर्व और रात्रि में सोने से पहले—भगवान का स्मरण अवश्य करना चाहिए।
इन तीनों समय पर किए गए स्मरण को तीन प्रकार के दान कहा गया है:
- स्मृति दान
- शक्ति दान
- शान्ति दान
नीचे इन तीनों का महत्व और संबंधित श्लोक दिए गए हैं।
१. स्मृति दान (प्रातःकाल का स्मरण)
प्रातः जागते ही प्रभु का स्मरण करना स्मृति दान कहलाता है।
हाथों को देखते हुए नीचे दिए गए श्लोकों का जाप करना अत्यंत शुभ माना गया है।
प्रातःकाल के श्लोक
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमूले सरस्वती।
करमध्ये तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
२. शक्ति दान (भोजन से पूर्व स्मरण)
भोजन ग्रहण करने से पहले भगवान को अर्पण भाव से याद करना शक्ति दान कहलाता है।
ये श्लोक भोजन को प्रसाद रूप में स्वीकार करने की भावना जगाते हैं।
भोजन पूर्व के श्लोक
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापाः ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
यत्करोषि यदश्नासि यज्जहुर्षि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
३. शान्ति दान (रात्रि का स्मरण)
सोने से पूर्व किए जाने वाला स्मरण शान्ति दान कहलाता है।
यह मन, वाणी और कर्म की शुद्धि देता है और दिनभर की त्रुटियों का क्षमाप्रार्थी बनाता है।
रात्रि के श्लोक
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत-क्लेश-नाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवण-नयन-जं वा मानसं वा अपराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
निष्कर्ष
त्रिकाल संध्या का अभ्यास:
- मन की शुद्धि
- आंतरिक ऊर्जा
- मानसिक शांति
- और आध्यात्मिक उन्नति
सभी का मार्ग प्रशस्त करता है।
नियमित अभ्यास से जीवन में सकारात्मकता और दिव्यता बनी रहती है।
त्रिकाल संध्या का महत्व
प्रातः स्मरण → आत्मशुद्धि व जागृति
मध्यान्ह ध्यान → धर्म और शक्ति की स्थिरता
संध्या प्रार्थना → मोह का नाश और शांति
FAQs
Q1. त्रिकाल संध्या क्या है?
त्रिकाल संध्या प्रातः, मध्यान्ह और सायं तीनों समय की प्रार्थना है, जो आत्मशुद्धि और ईश्वर से जुड़ने का साधन है।
Q2. त्रिकाल संध्या का पाठ कब करना चाहिए?
सुबह सूर्योदय से पहले, दोपहर 12 बजे के आसपास और सूर्यास्त के समय इसका पाठ करना शुभ माना जाता है।
Q3. त्रिकाल संध्या करने के क्या लाभ हैं?
यह साधना मानसिक शांति, पाप क्षय, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती है।
Q4. क्या त्रिकाल संध्या स्तोत्र ऑनलाइन उपलब्ध है?
हाँ, DivineEcho Vibrations पर त्रिकाल संध्या स्तोत्र के श्लोक, अर्थ और लाभ उपलब्ध हैं।
