श्री बद्रीनाथाष्टकम् | Sri Badrinathashtakam | बद्रीनाथ स्तोत्र

श्री बद्रीनाथाष्टकम् भगवान विष्णु के बद्रीनाथ धाम की स्तुति करने वाला दिव्य स्तोत्र है। इसका पाठ करने से जीवन में पुण्य, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

🌸 श्री बद्रीनाथाष्टकम् (श्लोक एवं भावार्थ)

१.

भू – वैकुण्ठ – कृतं वासं देवदेवं जगत्पतिं ।
चतुर्वर्ग – प्रदातारं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ १ ॥

👉 अर्थ – जो भगवान स्वयं भू-वैकुण्ठ (पृथ्वी पर वैकुण्ठ) बद्रीनाथ धाम में निवास करते हैं, जो देवों के भी देव और सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं, तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों के दाता हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।


२.

तापत्रय – हरं साक्षात् शान्ति – पुष्टि – बल – प्रदम् ।
परमानन्द – दातारं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ २ ॥

👉 अर्थ – जो भगवान प्रत्यक्ष ही जीवों के तीन प्रकार के कष्ट (दैविक, दैहिक और भौतिक) का नाश करते हैं, शांति, बल और पुष्ट‍ि (स्वास्थ्य) प्रदान करते हैं और परमानंद के दाता हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं नमन करता हूँ।


३.

सद्य: पापक्षयकरं सद्य: कैवल्य – दायकम् ।
लोकत्रय – विधातारं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ ३ ॥

👉 अर्थ – जो भगवान तुरंत ही पापों का नाश कर देते हैं और तत्काल ही मोक्ष (कैवल्य) प्रदान करते हैं, जो तीनों लोकों के सृजनहार हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।


४.

भक्त – वाञ्छा – कल्पतरुं करुणारस -विग्रहम् ।
भवाब्धि – पार – कर्तारं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ ४ ॥

👉 अर्थ – जो भगवान भक्तों की इच्छाएँ पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष समान हैं, जो करुणा के साक्षात् स्वरूप हैं, और जो इस संसार-सागर से पार लगाने वाले हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।


५.

सर्वदेव – स्तुतं सश्वत् सर्व – तीर्थास्पदं विभुम् ।
लीलयोपात्त – वपुषं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ ५ ॥

👉 अर्थ – जिनकी स्तुति सभी देवता करते हैं, जो सभी तीर्थों के आधार हैं, जो सर्वव्यापक हैं, और जो अपने लीला-विग्रह से भक्तों के कल्याण हेतु प्रकट होते हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।


६.

अनादिनिधनं कालकालं भीमयमच्युतम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ ६ ॥

👉 अर्थ – जो भगवान अनादि और अनंत हैं, काल के भी काल हैं, जो यमराज को भी भयभीत कर देते हैं, जो अच्युत (कभी न नष्ट होने वाले) हैं और जो स्वयं आश्चर्यों के भी आश्चर्य हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।


७.

गंदमादन – कूटस्थं नर – नारायणात्मकम् ।
बदरी खण्ड – मध्यस्थं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ ७ ॥

👉 अर्थ – जो भगवान हिमालय के गंधमादन पर्वत पर स्थित हैं, जो नर और नारायण रूप में तपस्या कर रहे हैं, और जो बदरीखंड के मध्य में विराजमान हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।


८.

शत्रूदासीन – मित्राणां सर्वज्ञं समदर्शिनम् ।
ब्रह्मानन्द – चिदाभासं श्रीबदरीशं नमाम्यहम ॥ ८ ॥

👉 अर्थ – जो भगवान मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, जो सर्वज्ञ हैं, और जो ब्रह्मानन्द तथा चैतन्य स्वरूप के प्रकाशक हैं, उन श्री बदरीनाथ प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।


९. (फलश्रुति)

श्री बद्रिशाष्टकमिदं यः पठेत प्रयतः शुचिः ।
सर्व – पाप – विनिर्मुक्तः स शांति लभते पराम् ॥ ९ ॥

👉 अर्थ – जो कोई भी इस श्री बद्रीनाथाष्टक स्तोत्र का पवित्र भाव और शुद्ध मन से पाठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है।


🌿 निष्कर्ष:
श्री बद्रीनाथाष्टकम् का नित्य पाठ करने से जीवन के सभी दुःख दूर होते हैं, मन में भक्ति और शांति आती है तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।

FAQs

Q1. श्री बद्रीनाथाष्टकम् का पाठ कब करना चाहिए?
👉 प्रातःकाल या संध्या समय, श्रद्धा और भक्ति भाव से इसका पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है।

Q2. बद्रीनाथाष्टकम् पाठ करने के क्या लाभ हैं?
👉 इसके पाठ से मन को शांति, जीवन में सुख-समृद्धि और भगवान बद्रीनाथ की कृपा प्राप्त होती है।

Q3. बद्रीनाथाष्टकम् किसने लिखा है?
👉 यह स्तोत्र विभिन्न आचार्यों और संतों द्वारा रचित माना जाता है, जो भगवान विष्णु के बद्रीनाथ रूप का गुणगान करता है।

Q4. क्या बद्रीनाथाष्टकम् केवल तीर्थ यात्रा पर ही पढ़ा जाता है?
👉 नहीं, इसे घर पर भी नियमित रूप से पढ़ा जा सकता है।