श्रीरङ्गस्तोत्रम् | Shriranga Stotram
श्रीरंग स्तोत्रम् भगवान श्रीरंगनाथ (विष्णु) की स्तुति है। इसमें 11 श्लोकों में भगवान की महिमा, स्वरूप और भक्तों के कल्याण का वर्णन है। अर्थ सहित पाठ से भक्ति और ज्ञान की वृद्धि होती है।
श्लोक 1
पद्माधिराजे गरुडाधिराजे विरिचराजे सुरराजराजे ।
त्रैलोक्यराजेऽखिलराजराजे श्रीरंगराजे रमतां मनो मे ॥ १ ॥
अर्थ
जो कमला (लक्ष्मी) के अधिपति हैं, गरुड़ के राजा हैं, ब्रह्मा के भी स्वामी हैं, देवताओं के देव हैं, तीनों लोकों के राजा और समस्त राजाओं के भी राजा हैं — उन श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा रमण करे।
श्लोक 2
नीलाब्जवर्णे भुजपूर्णकर्णे कर्णांतनेत्रे कमलाकलत्रे ।
श्रीमल्लरंगे जितमल्लरंगे श्रीरंगरंगे रमतां मनो मे ॥ २ ॥
अर्थ
जिनका रंग नीले कमल के समान है, जिनकी भुजाएँ कान तक फैली हुई हैं, जिनकी आँखें कानों के किनारों तक जाती हैं, जो लक्ष्मीजी के पति हैं, महान श्रीरंग में विराजमान हैं, जिन्होंने युद्ध में असुरों को परास्त किया — उनमें मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 3
लक्ष्मीनिवासे जगतां निवासे हृत्पद्मवासे रविबिंबवासे ।
क्षीराब्धिवासे फणिभोगवासे श्रीरंगवासे रमतां मनो मे ॥ ३ ॥
अर्थ
जो लक्ष्मी के निवास हैं, समस्त जगत के आधार हैं, भक्तों के हृदय-कमल में रहते हैं, सूर्य के तेज में स्थित हैं, क्षीरसागर में निवास करते हैं, और शेषनाग की शैय्या पर शयन करते हैं — ऐसे श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 4
कुबेरलीले जगदेकलीले मंदारमालांकितचारुफाले ।
दैत्यांतकालेऽखिललोकमीले श्रीरंगलीले रमतां मनो मे ॥ ४ ॥
अर्थ
जो कुबेर के समान ऐश्वर्य से युक्त लीला करने वाले हैं, जगत में अद्वितीय लीला वाले हैं, मंदार पुष्पों की माला से सुशोभित हैं, असुरों का संहार करने वाले हैं, और सभी लोकों को जोड़ने वाले हैं — उन श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 5
अमोघनिद्रे जगदेकनिद्रे विदेहनिद्रे च समुद्रनिद्रे ।
श्रीयोगनिद्रे सुखयोगनिद्रे श्रीरंगनिद्रे रमतां मनो मे ॥ ५ ॥
अर्थ
जिनकी निद्रा अमोघ है, जो संपूर्ण जगत के एकमात्र निद्राधारी हैं, जिनकी योगनिद्रा अपार आनंददायी है, और जो महासागर पर शेषशय्या में विश्राम करते हैं — उन श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 6
आनंदरुपे निजबोधरुपे ब्रह्मस्वरुपे क्षितिमूर्तिरुपे ।
विचित्ररुपे रमणीयरुपे श्रीरंगरुपे रमतां मनो मे ॥ ६ ॥
अर्थ
जो आनंद के स्वरूप हैं, आत्मज्ञान के स्वरूप हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, धरती पर अवतरित रूप में हैं, अद्भुत रूप वाले और रमणीय रूप वाले हैं — उन श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 7
भक्ताकृतार्थे मुररावणार्थे भक्तासमर्थे जगदेककीर्ते ।
अनेकमूर्ते रमणीयमूर्ते श्रीरंगमूर्ते रमतां मनो मे ॥ ७ ॥
अर्थ
जो अपने भक्तों की सभी इच्छाएँ पूर्ण करते हैं, मुर और रावण जैसे राक्षसों का नाश करते हैं, भक्तों के लिए समर्थ हैं, जगत में अद्वितीय कीर्ति वाले हैं, अनेक रूप धारण करने वाले हैं — उन श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 8
कंसप्रमार्थे नरकप्रमाथे दुष्टप्रमाथे जगतां निधाने ।
अनाथनाथे जगदेकनाथे श्रीरंगनाथे रमतां मनो मे ॥ ८ ॥
अर्थ
जो कंस का नाश करने वाले, नरकासुर का अंत करने वाले, दुष्टों का संहार करने वाले, जगत के आधार हैं, अनाथों के नाथ और पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं — उन श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 9
सच्चित्तशायी जगदेकशायी नंदांकशायी कमलांकशायी ।
अंबोधिशायी वटपत्रशायी श्रीरंगशायी रमतां मनो मे ॥ ९ ॥
अर्थ
जो सत्यचित्त में शयन करते हैं, जगत में एकमात्र शयन करने वाले हैं, नंद के आँगन में शयन करते हैं, लक्ष्मीजी की गोद में विश्राम करते हैं, समुद्र पर और वटपत्र पर शयन करते हैं — उन श्रीरंगनाथ में मेरा मन सदा लगे।
श्लोक 10
सकलदुरितहारी भूमिभारापहारी दशमुखकुलहारी दैत्यदर्पापहारी ।
सुललितकृतचारी पारिजातापहारी त्रिभुवनभयहारी प्रीयतां श्रीमुरारिः ॥ १० ॥
अर्थ
जो सभी पापों का नाश करते हैं, धरती का भार कम करते हैं, रावण के वंश का अंत करते हैं, दैत्यों के अहंकार को मिटाते हैं, सुंदर लीलाएँ करते हैं, पारिजात वृक्ष लाते हैं, और तीनों लोकों के भय को हर लेते हैं — वे श्रीमुरारि मुझे प्रिय हों।
श्लोक 11
रंगस्तोत्रमिदं पुण्यं प्रातःकाले पठेन्नरः ।
कोटिजन्मार्जितं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥ ११ ॥
अर्थ
जो व्यक्ति इस पवित्र रंग स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल करता है, उसके करोड़ों जन्मों से संचित पाप भी स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं।
FAQ (संक्षेप में)
श्रीरंग स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
प्रातःकाल स्नान के बाद शुद्ध भाव से।श्रीरंग स्तोत्र के लाभ क्या हैं?
पापों का नाश, मन की शांति और विष्णु कृपा की प्राप्ति।क्या इसे घर में पाठ सकते हैं?
हाँ, श्रद्धा और नियम से।किस भाषा में उपलब्ध है?
संस्कृत और अर्थ सहित हिंदी।
