कुलदेवी स्तोत्रम् | Kuldevi Stotram | देवी स्तुति
"कुलदेवी स्तोत्रम्" एक पवित्र स्तुति है जिसे परिवार की कुल देवी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र परिवार की रक्षा, उन्नति और समृद्धि सुनिश्चित करता है, तथा नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है।
(1)
ॐ नमस्ते श्री शिवाय कुलाराध्या कुलेश्वरी।
कुलसंरक्षणी माता कौलिक ज्ञान प्रकाशिनी।।
अर्थ:
हे श्रीकुलेश्वरी! हे कुल की आराध्या माता! आपको प्रणाम है। आप हमारे कुल की रक्षक हैं और कौलिक ज्ञान (परंपरागत आध्यात्मिक ज्ञान) का प्रकाश फैलाने वाली हैं।
(2)
वन्दे श्री कुल पूज्या त्वाम् कुलाम्बा कुलरक्षिणी।
वेदमाता जगन्माता लोक माता हितैषिणी।।
अर्थ:
मैं आपको वंदन करता हूँ, जो पूरे कुल की पूज्या हैं, कुल की माता और रक्षक हैं। आप वेदों की माता, जगत की माता और सभी प्राणियों का हित चाहने वाली हैं।
(3)
आदि शक्ति समुद्भूता त्वया ही कुल स्वामिनी।
विश्ववंद्यां महाघोरां त्राहिमाम् शरणागत:।।
अर्थ:
हे कुलस्वामिनी! आप आदि शक्ति से उत्पन्न हुई हैं, विश्व की वंदनीय और महान शक्ति हैं। मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
(4)
त्रैलोक्य ह्रदयं शोभे देवी त्वं परमेश्वरी।
भक्तानुग्रह कारिणी कुलदेवी नमोस्तुते।।
अर्थ:
हे देवी! आप तीनों लोकों के हृदय की शोभा हैं, परमेश्वरी हैं, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली हैं। हे कुलदेवी! आपको मेरा नमस्कार।
(5)
महादेव प्रियंकरी बालानां हितकारिणी।
कुलवृद्धि करी माता त्राहिमाम् शरणागतम्।।
अर्थ:
हे माता! आप महादेव की प्रिय हैं, बालकों का कल्याण करने वाली और कुल की उन्नति कराने वाली हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
(6)
चिदग्निमण्डल संभुता राज्य वैभव कारिणी।
प्रकटीतां सुरेशानी वन्दे त्वां “कुल गौरवाम्”।।
अर्थ:
आप चिदग्नि मंडल से प्रकट हुई हैं, राज्य वैभव देने वाली और देवताओं की रानी हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ, जो कुल का गौरव हैं।
(7)
त्वदीये कुले जात: त्वामेव शरणम गत:!
त्वत वत्सलोहं आद्ये त्वं रक्ष रक्षाधुना।।
अर्थ:
मैं आपके ही कुल में जन्मा हूँ और आपकी ही शरण में आया हूँ। हे आद्ये! मैं आपका पुत्र समान हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
(8)
पुत्रं देहि धनं देहि साम्राज्यं प्रदेहि मे।
सर्वदास्माकं कुले भूयात मंगलानु शाशनम।।
अर्थ:
हे माता! मुझे पुत्र दो, धन दो, राज्य और साम्राज्य दो। हमारे कुल में सदा मंगल और सुख-समृद्धि बनी रहे।
(9)
कुलाष्टकमिदं पुण्यं नित्यं य: सुकृति पठेत।
तस्य वृद्धि कुले जात: प्रसन्ना कुलेश्वरी।।
अर्थ:
जो पुण्यात्मा प्रतिदिन इस कुलाष्टक का पाठ करता है, उसके कुल की वृद्धि होती है और कुलेश्वरी माता प्रसन्न रहती हैं।
(10)
कुलदेवी स्त्रोत्मिदम, सूपुण्यं ललितं तथा।
अर्पयामी भवत भक्त्या, त्राहिमां शिव गेहिनी।।
अर्थ:
यह कुलदेवी स्तोत्र बहुत पुण्यदायी और सुंदर है। मैं इसे भक्तिभाव से आपको अर्पित करता हूँ, हे शिवपत्नी! मेरी रक्षा करें।
Importance (महत्व संक्षेप में)
कुल की देवी का आशीर्वाद — परिवार की उन्नति और रक्षा।
नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा — मानसिक व आध्यात्मिक शांति।
समृद्धि और सफलता — व्यापार, करियर और घर में सकारात्मक ऊर्जा।
श्री गणेश का दिव्य अथर्वशीर्ष पाठ यहाँ देखें
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. कुलदेवी स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
प्रत्येक शुभ अवसर, नवरात्रि, विवाह, गृहप्रवेश और पूजा के समय।
Q2. क्या कुलदेवी स्तोत्र किसी भी देवी के लिए पढ़ा जा सकता है?
हाँ, लेकिन सर्वोत्तम परिणाम के लिए अपनी कुल देवी के नाम और भाव के साथ पढ़ें।
Q3. इसका पाठ कितनी बार करना चाहिए?
नियमित रूप से प्रतिदिन सुबह या सप्ताह में कम से कम एक बार।
Q4. क्या इसे घर में पढ़ना शुभ है?
हाँ, घर में पढ़ने से पूरे परिवार पर देवी का आशीर्वाद बना रहता है।
