श्रीगुरु नरसिंह सरस्वती स्तोत्र | इंदुकोटि स्तोत्रम् | Indukoti Stotram with Lyrics and Meaning

इंदुकोटि स्तोत्रम् (श्रीगुरु नरसिंह सरस्वती स्तोत्र) — श्री नरसिंह सरस्वती भगवान की महिमा का अद्भुत स्तोत्र। इस स्तोत्र में भगवान श्रीगुरु की अनंत शक्तियों का वर्णन है। यहाँ पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और PDF डाउनलोड उपलब्ध है।

इंदुकोटि स्तोत्रम् — श्रीगुरु नरसिंह सरस्वती स्तोत्र

🌺 श्लोक १

इंदुकोटि तेजकीर्ण सिंधुभक्तवत्सलं ।
नंदनात्रिसूनुदत्त इंदिराक्ष श्रीगुरुं ।
गंधमाल्याक्षतादि वृंददेववंदितं ।
वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम् ॥१॥

हिंदी अर्थ :
जिनका तेज करोड़ों चंद्रमाओं के समान है, जो भक्तों के प्रति सागर समान करुणामय हैं,
जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पुत्रदत्त हैं, लक्ष्मी समान नेत्रों वाले श्रीगुरु नरसिंह सरस्वती —
गंध, पुष्प, अक्षत और देवताओं द्वारा पूजित, मैं उन श्रीगुरु को नमस्कार करता हूँ।
हे प्रभु! मेरी रक्षा करें।


🌺 श्लोक २

मायापाशअंधकारछायादूतभास्करं ।
आयताक्षि पाहि श्रिया वल्लभेश नायकं ।
सेव्यभक्तवृंदवरद भूयोभूयो नमाम्यहं ॥वंदयामि०॥२॥

हिंदी अर्थ :
जो माया के बंधन और अंधकार को सूर्य के समान नष्ट कर देते हैं,
जिनके नेत्र विशाल हैं, जो लक्ष्मीपति भगवान के अधिपति हैं,
भक्तों द्वारा सदा सेवित और वरदाता श्रीगुरु को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।


🌺 श्लोक ३

चितजादिवर्गषट्कमत्तवारणांकुशं ।
तत्त्वासारशोभितात्मदतश्रीयवल्लभं ।
उत्तमावतारभूतकर्तृभक्तवत्सलं ॥वंदयामि०॥३॥

हिंदी अर्थ :
जो चैतन्य और जड़—इन छह प्रकार के तत्वों के ज्ञाता हैं,
जिनका आत्मा तत्त्वज्ञान से शोभित है,
जो श्रीवल्लभ भगवान के अवताररूप हैं और भक्तों के प्रति अत्यंत स्नेहमय हैं —
ऐसे श्रीगुरु नरसिंह सरस्वती को मैं नमस्कार करता हूँ।


🌺 श्लोक ४

व्योमआपवायुतेजभूमिकर्तृमीश्वरं ।
कामक्रोधमोहरहित सोमसूर्यलोचनं ।
कामितार्तदातृभक्तकामधेनुश्रीगुरुं ॥वंदयामि०॥४॥

हिंदी अर्थ :
जो आकाश, जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी — इन पंचमहाभूतों के कर्ता हैं,
जिनके नेत्र चंद्र और सूर्य समान हैं,
जो काम, क्रोध, मोह से रहित हैं,
और भक्तों की सभी कामनाएँ पूरी करने वाले कामधेनुरूप श्रीगुरु हैं —
उनको मैं नमन करता हूँ।


🌺 श्लोक ५

पुंडरीकअयताक्षकुंडलेंदूतेजसं ।
चंडदुरितखंडनार्थश्रीगुरुं ।
दंडधारिमंडलीकमौलिमार्तण्डभासिताननं ॥वंदयामि०॥५॥

हिंदी अर्थ :
जिनके नेत्र कमल समान और विशाल हैं, कानों में कुंडल शोभायमान हैं,
जिनका मुख सूर्य के समान प्रकाशित है,
जो दंड धारण करते हैं, और दुष्टों के पापों का नाश करते हैं —
ऐसे तेजस्वी श्रीगुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।


🌺 श्लोक ६

वेदशास्त्रस्तुत्यपादआदिमूर्ति श्रीगुरुं ।
नादकलातीतकल्पपादपादेसेव्ययं ।
सेव्यभक्तवृंदवरदभूयोभूयो नमाम्यहं ॥वंदयामि०॥६॥

हिंदी अर्थ :
जिनके चरण वेद और शास्त्रों द्वारा वंदनीय हैं,
जो सृष्टि के आदि रूप हैं,
जिनका स्वरूप नाद और कला से परे है,
भक्तों द्वारा सदा सेवित और वर देने वाले — उन श्रीगुरु को बार-बार नमस्कार करता हूँ।


🌺 श्लोक ७

अष्टयोगतत्त्वनिष्ठतुष्टज्ञानवारिधिं ।
कृष्णावेणितीरवारपंचनद्यसंगमं ।
कष्टदैन्यदूरभक्ततुष्टकामदायकं ॥वंदयामि०॥७॥

हिंदी अर्थ :
जो अष्टांग योग के तत्त्व में स्थित हैं, ज्ञानसागर हैं,
जो कृष्णा और वेण्या नदियों के संगम (गुरुपीठ — गाणगापुर) में विराजमान हैं,
जो भक्तों के दुःख-दैन्य को दूर कर संतोष और इच्छित फल देते हैं —
उन श्रीगुरु को मैं नमन करता हूँ।


🌺 श्लोक ८

नारसिंहसरस्वतीशनाममष्टमौक्तिकं ।
हारकृत्यशारदेनगंगाधराख्यात्मजं ।
धारणीकदेवदीक्षगुरुमूर्तितोषितं ।
परमात्मानंदश्रियापुत्रपौत्रदायकं ॥वंदयामि०॥८॥

हिंदी अर्थ :
यह नारसिंह सरस्वती नामरूपी आठ मोतियों का हार है,
जो स्वयं सरस्वतीदेवी द्वारा रचा गया है,
गंगाधर नामक महान आत्मा के पुत्र हैं,
जो परमात्मानंद रूप हैं, और भक्तों को पुत्र-पौत्र तथा परम आनंद प्रदान करते हैं —
ऐसे श्रीगुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।


🌺 श्लोक ९

नारसिंहसरस्वतीअष्टकंचयः पठेत् ।
घोरसंसारसिंधुतारणाख्यसाधनं ।
सारज्ञानदीर्घमायुरारोग्यादिसंपदा ।
चारुवर्गकाम्यलाभवारंवारयज्जपेन् ॥वंदयामि०॥९॥

हिंदी अर्थ :
जो यह श्रीनरसिंह सरस्वती अष्टक (इंदुकोटि स्तोत्र) का पाठ करता है,
वह भयंकर संसार-सागर से पार होता है,
उसे सारभूत ज्ञान, दीर्घ आयु, आरोग्य, समृद्धि और सभी इच्छित वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
जो इसे बार-बार जप करता है, उसे परम लाभ मिलता है।


🌼 सारांश

👉 यह स्तोत्र श्रीगुरु नरसिंह सरस्वती (श्रीदत्तात्रेय के द्वितीय अवतार) की भक्ति, ज्ञान, और कृपा का दिव्य स्तोत्र है।
प्रतिदिन इसका पाठ करने से संसार दुखों से मुक्ति, आरोग्य, शांति और आध्यात्मिक तेज प्राप्त होता है।