काशीपञ्चकम् | Kashi Panchakam

“काशीपञ्चकम्” एक अद्भुत स्तोत्र है, जो काशी नगरी की महिमा और आत्मज्ञान के महत्व का वर्णन करता है। इसका पाठ करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

🌸 काशीपञ्चकम् श्लोक एवं अर्थ 🌸

१.

मनोनिवृत्तिः परमोपशान्तिः
सा तीर्थवर्या मणिकर्णिका च ।
ज्ञानप्रवाहा विमलादिगङ्गा
सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ १॥

👉 अर्थ:
जहाँ मन निवृत्त होकर शान्त हो जाता है, वही मणिकर्णिका तीर्थ है।
जहाँ ज्ञान का पवित्र प्रवाह होता है, वही विमला गंगा है।
वह काशी (ज्ञान की नगरी) वास्तव में मेरा अपना आत्मबोध स्वरूप ही है।


२.

यस्यामिदं कल्पितमिन्द्रजालं
चराचरं भाति मनोविलासम् ।
सच्चित्सुखैका परमात्मरूपा
सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ २॥

👉 अर्थ:
जहाँ यह सम्पूर्ण जगत्‌ (चराचर), मन के विलास रूप में, एक मायाजाल की तरह दिखाई देता है,
और जहाँ केवल सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा ही विद्यमान है –
वही काशी है, जो मेरा अपना आत्मबोध स्वरूप है।


३.

कोशेषु पञ्चस्वधिराजमाना
बुद्धिर्भवानी प्रतिदेहगेहम् ।
साक्षी शिवः सर्वगतोऽन्तरात्मा
सा काशिकाहं निजबोधरूपा ॥ ३॥

👉 अर्थ:
पाँच कोशों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय) पर राज्य करने वाली बुद्धि ही भवानी है,
प्रत्येक शरीर उसका ही घर है।
सभी में विद्यमान, साक्षीस्वरूप, अन्तर्यामी आत्मा ही शिव हैं।
वही काशी है, जो मेरा आत्मबोध स्वरूप है।


४.

काश्यां हि काश्यते काशी
काशी सर्वप्रकाशिका ।
सा काशी विदिता येन
तेन प्राप्ता हि काशिका ॥ ४॥

👉 अर्थ:
काशी वह है जहाँ से सब प्रकाशित होते हैं।
काशी वास्तव में प्रकाश और ज्ञान की अधिष्ठात्री है।
जिसने काशी (आत्मज्ञान) को जान लिया, उसी ने सच्ची काशी को प्राप्त कर लिया।


५.

काशीक्षेत्रं शरीरं त्रिभुवनजननी व्यापिनी ज्ञानगङ्गा ।
भक्तिः श्रद्धा गयेयं निजगुरुचरणध्यानयोगः प्रयागः ।
विश्वेशोऽयं तुरीयः सकलजनमनःसाक्षिभूतोऽन्तरात्मा
देहे सर्वं मदीये यदि वसति पुनस्तीर्थमन्यत्किमस्ति ॥ ५॥

👉 अर्थ:
मेरा शरीर ही काशीक्षेत्र है,
ज्ञान की धारा ही गंगा है,
भक्ति ही श्रद्धा रूपी गया है,
और गुरुचरण में ध्यान ही प्रयाग है।

संपूर्ण लोकों के साक्षी रूप जो अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे ही विश्वेश्वर शिव हैं,
जो मेरे इस शरीर में तुरीय (चेतना) स्वरूप में स्थित हैं।
यदि ऐसा आत्मज्ञान मेरे भीतर है, तो अन्य कोई तीर्थ की आवश्यकता ही नहीं।


✨ सारांश

काशीपञ्चकम् का गूढ़ संदेश यह है कि वास्तविक काशी बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर आत्मज्ञान और शिवबोध के रूप में स्थित है। जो साधक इस सत्य को पहचान लेता है, उसके लिए मोक्ष दूर नहीं।

FAQ 

Q1: काशीपञ्चकम् किसने रचा है?
👉 यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है।

Q2: काशीपञ्चकम् का पाठ कब करना चाहिए?
👉 प्रातःकाल या शिव पूजा के समय इसका पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है।

Q3: काशीपञ्चकम् पाठ के क्या लाभ हैं?
👉 यह आत्मज्ञान, वैराग्य, मोक्ष और भगवान शिव की कृपा प्रदान करता है।

Q4: क्या काशीपञ्चकम् केवल काशीवासियों के लिए है?
👉 नहीं, यह स्तोत्र कोई भी श्रद्धा और भक्ति से पढ़ सकता है।